भारत में मीडिया की स्वतंत्रता की आड़ में अपना एजेंडा चला रहा है बीबीसी!
अंतरराष्ट्रीय स्तर की मीडिया संस्थाओं में कई मीडिया चैनल अपनी पहचान बनाए हुए हैं. ज्यादातर संस्थाओं पर किसी विशेष विचारधारा के पक्षधर होने का आरोप है. अंतरराष्ट्रीय स्तर की मीडिया संस्था के रूप ब्रिटिश ब्रॉडकास्टिंग कॉरपोरेशन यानी बीबीसी ने भी अपना दबदबा कायम किया है. यह भारत में भी लंबे समय से सक्रिय है. हालांकि भारत में इसे एक विशेष विचाराधारा से प्रभावित या कहें कि ज्यादातर भारतवासी इसे देशविरोधी संस्थान के रूप में देखते हैं. यह मेरे अपने विचार नहीं बल्कि धरातल का सच है. ब्रिटिश ब्रॉडकास्टिंग कॉरपोरेशन अपने देश यानी यूके का सरकारी मीडिया संस्थान है. इसका मुख्यालय लंदन में स्थित है. जाहिर है वहां के लोगों के कमाई के टैक्स से यह संचालित होता है. नैतिकता के आधार पर इसे अपने नागरिकों का सगा होना चाहिए और यह है भी. मगर कई दफा यह पाया गया कि बीबीसी सच के बजाए फेक खबरों या किसी एजेंडे के तहत प्रसारण कर रहा हो.
पांचजन्य में छपे एक लेख के अनुसार बीबीसी को भारत विरोधी एजेंडे और फेक न्यूज़ की बड़ी फ़ैक्ट्री करार दिया गया है. इन आरोपों को सही साबित करने के लिए लेख में कुछ तथ्यों का भी जिक्र है. लेख के अनुसार बीबीसी पर सबसे पहला आरोप मौजूदा हालात पर नजर रखते हुए है. कहा गया है कि कोरोना महामारी के दौरान बीबीसी भारत को लेकर लगातार अपमानजनक और नस्लभेदी टिप्पणियां कर रहा है. साथ ही यह सवाल भी किया गया है कि अगर भारतीय सरकारी मीडिया भी ब्रिटेन को लेकर ऐसे ही दुष्प्रचार करने लगे तो वहां के लोगों और वहां की सरकार को कैसा लगेगा? हालांकि मीडिया एक स्वायत्त संस्था है और उससे यह उम्मीद की जाती है कि वह तथ्य और सच लोगों को अवगत कराए. मगर बीबीसी पर लगे यह आरोप उसकी विश्वसनीयता पर सवाल खड़ा करता है.
लेख में बीबीसी के भारत विरोधी होने के तथ्य के रूप में बताया गया कि धारा 370 हटे एक साल होने को हैं लेकिन बीबीसी अब भी जम्मू कश्मीर को 'भारत प्रशासित क्षेत्र' लिखता है. अरुणाचल और उत्तर पूर्व के कुछ क्षेत्रों को लेकर भी अक्सर ऐसी आपत्तिजनक रिपोर्टिंग करने का आरोप लगाया गया है. भारतीय सरकारी कंपनी जीवन बीमा निगम को लेकर झूठी ख़बरें प्रसारित की गईं और यह बताया कि एलआईसी कंगाल हो चुकी है. इस लेख में सबसे बड़ा तथ्य यह बताया गया है कि बीबीसी हिंदी ने एक कार्टून छापा जिसमें मास्क लगाना ज़रूरी करने के केंद्र सरकार के आदेश पर व्यंग्य किया गया है. इसमें दिखाया गया कि इससे भारतीयों को अपने तन के वस्त्र फाड़कर मास्क बनाने पड़ेंगे. इसे व्यंग्य नहीं बल्कि नस्लभेदी मानसिकता करार दिया गया है. जाहिर है दुनिया कोरोना महामारी के मार से नहीं बच पाई है तो भारत ही क्या. तो इस समय ऐसे व्यंग करना मानसिक विक्षिप्तता को ही दर्शाता है. लेकिन इतना जरूर है कि भारत ने जो कर दिखाया है वह दुनिया के सामने नजीर बनकर उभरा है. तमाम विकसित देश, स्वास्थ्य सुविधाओं से लैश, साधन सम्पन्न अनेकों देश कोरोना के सामने घुटने टेक दिए हैं तो ऐसे हालात में भारत उन सभी कि हाइड्रोक्लोरोक्वीन जैसी दवाएं भेजकर मदद कर रहा है जो कोरोना के इलाज में अब तक विश्वसनीय मानी जा रही है.
बीबीसी द्वारा भारत की ओर हाइड्रोक्लोरोक्वीन के निर्यात किए जाने के फैसले पर भी टिप्पणी किया गया और कहा गया कि इससे भारत में इस दवा की कमी हो जाएग और वह अपने नागरिकों का इलाज नहीं कर सकेगा. जबकि यह तर्क बिल्कुल निराधार है. इस खबर के छपने के एक दिन बाद ही ब्रिटेन ने भी कोरोना पीड़ितों के लिए भारत से हाइड्रोक्लोरोक्वीन दवा की मांग की. जबकि वहां का सरकारी मीडिया संस्थान भारत के इस निर्णय का मजाक बना रहा है. मानवीय संवेदनाओं से समृद्ध भारत के लिए मुश्किल वक्त में दूसरों की मदद करना परम धर्म है. लेकिन बीबीसी के लिए यह एक व्यापार भर है. भारत विरोध से जुड़ी बातें हो और चीन का नाम न आए यह बात भी गले नहीं उतरती. दरअसल, बीबीसी के इस रवैये के पीछे चीन को भी एक बड़ी वजह माना जा रहा है. लेख में दावा किया गया है कि बीबीसी चीन की कठपुतली बन चुका और यह भी कहा गया कि भारतीय सेवाओं में कभी भी चीन के विरोध या आलोचना में कोई खबर प्रसारित नहीं करता है.
अब बात करते हैं कोरोना से जुड़े कुछ आंकड़ो की. देखा जाए तो ब्रिटेन में अब तक कोरोना संक्रमितों की संख्या 143,464 पहुंच चुकी है और 19,506 की मौत हो चुकी है. कोरोना के प्रकोप से ब्रिटेन लगभग मौत के मुहाने पर खड़ा है और उसका सरकारी मीडिया संस्थान भारत की खिल्ली उड़ा रहा है जहां 125 करोड़ आबादी वाले देश भारत में अब तक 24,434 मामले ही आए हैं. हालांकि यह भी हमारे लिए बहुत दुख भरी खबर है. क्योंकि हम मौत को जश्न नहीं बल्कि मातम कहते हैं. वहीं चीन जिसने कोरोना को जन्म दिया और अब उसपर आंकडो़ं को हेर फेर करने का आरोप है वहां पर भी कोरोना संक्रमितों का आंकड़ा 82,804 हैं. फिलहाल यह दावा किया जा रहा है कि चीन का वास्तविक आंकड़ा इससे चार से पांच गुना अधिक है.

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