गांधी जी का वह आखिरी आंदोलन, जिसने देश को अंग्रेजों के चंगुल से किया आजाद
भारत छोड़ो आंदोलन अंग्रेजों के विरुद्ध चलाया गया गांधी जी के नेतृत्व में व्यापक आंदोलन था. यह आंदोलन ऐतिहासिक परिवर्तन का आधार बना. अब तक गांधी जी के नेतृत्व में देश में अंग्रेजों के खिलाफ कई सफल व असफल आंदोलन हो चुके थे. मगर भारत छोड़ो आंदोलन अलग कहानी लिखने की ओर बढ़ रहा था. यह आंदोलन एक रणनीति के साथ शुरू किया गया था और विश्वास से भरपूर था. गांधी जी का अपना सिद्धांत यहां पर भी कायम रहा. उन्होंने अहिंसा के सहारे इस आंदोलन को आगे बढ़ाया.
भारत अंग्रेजों के अत्याचार और अनाचार के दंश से जल रहा था. हर भारतीय के मन में स्वतंत्रता की चिंगारी अब शोला बन रही थी. जिसे सामान्य तरीके से रोक पाना मुश्किल हो रहा था. जहां हर भारतीय के सब्र का बांध टूट चुका था और उन्होंने अंग्रेजों को देश से बाहर का रास्ता दिखाने का मन बना लिया था तो वहीं किसान, विद्यार्थी, नौजवान, बूढ़े आंदोलन के लिए तैयार खड़े थे. याद दिलाएं तो 1915 में गांधी जी ने इंग्लैंड से पढ़ाई पूरी कर वतन वापसी की थी. भारत आते ही उन्होंने हक और हुकूम के लिए आंदोलन करना शुरू कर दिया था. कई मौकों पर उनका अंग्रेजों से सामना हुआ. गांधी जी को हक और स्वतंत्रता की लड़ाई में जेल भी जाना पड़ा. लेकिन गांधी जी का एक के बाद एक आंदोलन देशवासियों के भीतर स्वतंत्रता की भावना को प्रबल बनाता रहा.
अंग्रेजों के अत्याचार से थक चुका भारत अब स्वतंत्रता की सांस लेना चाह रहा था. इसके लिए प्रयत्न भी जोर शोर से शुरू हो गए थे. 30 जनवरी 1930 को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने पूर्ण स्वराज की घोषणा कर दी थी. कांग्रेस ने देश को अंग्रेजों के चंगुल से निकालने का खुला ऐलान कर दिया था. इस समय गांधी जी कांग्रेस के नेतृत्वकर्ता में सबसे प्रमुख नेता थे. देश उन्हें ही अपना नेता मान रहा था. इसी बीच 12 अप्रैल को नमक यात्रा यानी दांडी यात्रा निकाली गई. जो अंग्रेजों के खिलाफ बगावत के सुर को बुलंद करने में कारगर साबित हुई. इस आंदोलन की व्यापकता का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि गांधी जी के साथ साथ करीब 80000 लोगों ने गिरफ्तारी दी थी.
1940 का दशक आते आते गांधी जी एक बार सक्रिय हो चुके थे. देशवासियों को खुली सांस में जीने की आजादी होनी चाहिए ऐसा उन्होंने मन बना लिया था. 1942 में द्वितीय विश्व युद्ध छिड़ गया, ग्रेट ब्रिटेन जब इस युद्ध में उलझा था तब गांधीजी ने 8 अगस्त 1942 को भारत छोड़ो आंदोलन की शुरुआत की. यह आंदोलन गांधी जी के प्रमुख आंदोलनों में से प्रमुख आंदोलन था. इसका उद्देश्य भारत से अंग्रेजों को बाहर निकालना था. इसे पूरी रणनीति के साथ अंजाम देने की तैयारी थी लेकिन सही रणनीतिक तैयारी न होने के चलते यह आंदोलन भी असफल साबित हो गया. इस आंदोलन में विद्यार्थी, किसान, मजदूर, नौजवान आदि सभी वर्गों के लोग जुट रहे थे. देश के हर हिस्से में इस आंदोलन को चलाने की तैयारी थी. इस आंदोलन की शुरुआत देश के विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग तिथियों पर की गई जो कि इसकी असफलता का कारण सिद्ध हुआ.
अगस्त 1942 में अंग्रेजों ने गांधी जी, उनकी पत्नी और इंडियन नेशनल कांग्रेस के अन्य नेताओं को गिफ्तार कर लिया, इन सबको पुणे के आगाखान पैलेस में रखा गया. 19 महीने के बाद गांधी को रिहा किया गया लेकिन जेल में उनकी पत्नी की मृत्यु हो गई, फरवरी 1944 में उनकी पत्नी ने उनकी बांहों अंतिम सांस ली. इस आंदोलन में लगभग 1,00,000 से अधिक लोग गिरफ्तार किए गए थे, कई नागरिकों और प्रदर्शनकारियों को पुलिस ने गोली मार दी थी. इससे यह आंदोलन बुरी तरह से विफल हो गया. इस आंदोलन के कई राजनीतिक दलों जैसे, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस), हिन्दू महासभा, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, भारतीय बड़े व्यापारी आदि लोगों द्वारा समर्थन नहीं मिला.
यह आंदोलन एकजुटता के अभाव में भले ही असफल साबित हो गया था लेकिन अंग्रेजों को यह बात समझ में आने लगी थी कि अब उन्हें भारत की सत्ता भारतवासियों को वापस सौंपनी ही होगी. हालांकि भारत छोड़ो आंदोलन के असफलता के बाद कांग्रेस पार्टी के साथ ही साथ लोगों में एकजुट होने की भावना पैदा हो गई. लोगों की एकजुटता से अंग्रेजों को बेचैनी बढ़ती जा रही थी. इसी तरह अंग्रेज सन 1947 को भारत छोड़ कर वापस ब्रिटेन चले गये. इस तरह से भारत छोड़ो आंदोलन ने भारत को आजादी दिलाने में अपना अहम योगदान दिया.



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