बिहार को विशेष राज्य के दर्जे की जरूरत क्यों पड़ी. बिहार को इस हालत में पहुँचाने का ज़िम्मेदार कौन है?
बिहार भारत के उत्तर-पूर्वी भाग के मध्य में स्थित एक प्रसिद्ध ऐतिहासिक राज्य है. इसकी अपनी पहचान ऐतिहासिक विरासतों, सामाजिक आंदोलनों व क्रांति से है तो साथ ही कृषि समृद्ध भूमि, व्यापक नदी संपर्क, प्रसिद्ध पर्यटन स्थलों और नेपाल के साथ साझा होने वाली अंतरराष्ट्रीय सीमा के लिए जाना जाता है. देश में उत्तर प्रदेश के बाद बिहार को ही सत्ता का बड़ा केंद्र माना जाता है. चूंकि इनकी आबादी पूरे देश में पाई जाती है और इनकी संख्या भी बहुतायत है. बिहार की जनसंख्या का अधिकांश भाग ग्रामीण है और केवल 11.3 प्रतिशत लोग नगरों में रहते हैं.
नालंदा व तक्षशिला जैसे विश्वविद्यालयों के जरिए देश-दुनिया को शिक्षा का पाठ पढ़ाने वाले बिहार की हालत आज बिल्कुल ठीक नहीं हैं. यह अविकसित राज्यों में से एक है. यहां पर बेरोजगारी और गरीबी तथा पलायन चरम पर है. स्थिति ये आ चुकी है कि राज्य सरकार केंद्र के मुहाने बैठकर विशेष राज्य का दर्जा मांग रही हैं. केंद्र को इसका प्रस्ताव भी भेजा गया. आंकड़ों के साथ तर्क भी प्रस्तुत किए गए. राज्य को गरीबी से बाहर निकालने और कल्याणकारी योजनाओं के लिए 2.50 लाख करोड़ की आवश्यकता बताई गई. मानना है कि विशेष राज्य का दर्जा मिलते ही सारे संकट दूर हो जाएंगे और बिहार एक समृद्ध और आर्थिक संपन्न राज्य बन जाएगा. हालाँकि, दो सवाल जरूर सामने आते हैं कि बिहार को इसकी जरूरत क्यों पड़ीं और क्या विशेष पैकेज से बिहार की समस्याएँ हल हो जाएँगी?
विशेष राज्य के दर्जे का मतलब
पहले तो बता दें कि भारत के संविधान में विशेष राज्य का दर्जा देने की कोई योजना नहीं है. पहली बार साल 1969 में पांचवें वित्त आयोग की सिफारिश पर केंद्र सरकार ने असम, नगालैंड और जम्मू-कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा दिया था. केंद्र के अपने एक फॉर्मूले के अनुसार और इस पर खरे उतरने वाले राज्यों को इसका दर्जा दिया जाता है. इसमें ऐसे राज्य शामिल किए जाते हैं जो अविकसित होते हैं और राज्य के संवर्धन के लिए विशेष सहयोग चाहते हैं. समग्र विकास के मद्देनजर कुछ राज्यों को केंद्र विशेष श्रेणी में रखती है. वर्तमान में करीब 11 राज्यों को विशेष राज्य की श्रेणी में रखा गया है.
किस आधार पर मिलता है विशेष राज्य का दर्जा
पहाड़ी और दुर्गम इलाके वाले राज्य, जनसंख्या घनत्व कम होने व आदिवासी बहुल, राज्य की सीमा अंतरराष्ट्रीय सीमा से लगने, आर्थिक रूप से पिछड़े राज्य, राज्यों के कर्ज व कोष की स्थिति जैसे आधार का आकलन करते हुए विशेष राज्य का दर्जा केंद्र द्वारा प्रदान की जाती है.
बिहार को विशेष राज्य के दर्जे की जरूरत क्यों ?
ऊपर विशेष राज्य का दर्जा मतलब और आधार पर चर्चा की गई है. जिससे यह समझने में आसान हो जाता है कि आखिर बिहार के लिए विशेष राज्य के पैकेज की जरूरत क्यों पड़ी? आजादी के 75 वर्षों के बाद भी बिहार की एक बड़ी आबादी गरीबी से जूझ रही है. बिहार सरकार की हालिया रिपोर्ट में कहा गया है कि राज्य के 94 लाख परिवारों की आय 6 हजार से भी कम है. बिहार में गरीब परिवार की संख्या करीब 34.13 प्रतिशत है. राज्य के करीब 63.74 प्रतिशत परिवारों की मासिक आय 10 हजार तक है. केवल 9.83 प्रतिशत परिवार ही 50 हजार तक महीना कमाते हैं. बिहार के अधिकांश लोग या तो बेरोजगार हैं या दिहाड़ी मजदूरी कर अपना जीवन-यापन कर रहे हैं. राज्य में 32.1 प्रतिशत लोगों ने स्कूल का मुंह ही नहीं देखा है. स्नातक की शिक्षा राज्य की मात्र सात प्रतिशत आबादी को ही नसीब हो सकी है. बिहार में 36.76 प्रतिशत परिवारों के पास ही दो या उससे अधिक कमरों का अपना पक्का मकान है. जबकि, खपरैल या टीन की छत वाले गृहस्वामी 26.54 तथा झोपड़ी वाले 14.09 प्रतिशत हैं, वहीं 0.24 फीसद परिवार आवास विहीन हैं.
बिहार का विभाजन होने के बाद यहां का सारा खनिज खज़ाना निकल गया. इससे बिहार के पास राजस्व का कोई बड़ा स्रोत नहीं रह गया है. जनसंख्या का अधिक दबाव विकास के लिए बड़ी चुनौती बनती जा रही है. राज्य में प्राकृतिक संसाधनों की कमी है तथा प्रति वर्ष बाढ़ एवं सूखे की समस्याओं का सामना करना पड़ता है जो अर्थव्यवस्था के विकास में बड़ी बाधा है. पिछले डेढ़ दशकों से अच्छे विकास दर के बावजूद बिहार राज्य विकास के अनेक सूचकांकों पर काफी पीछे है. विशेष राज्य का दर्जा मिलने से यह प्रगति की दर और अधिक तेज हो जाएगी तथा बिहार अग्रणी राज्यों की श्रेणी में आ पाएगा.
बिहार को इस हालत में पहुँचाने का ज़िम्मेदार कौन है?
इसका सीधा सा जवाब है राज्य की सरकारें और कुछ हद तक केंद्र सरकार और बिहार की जनता भी इसकी जिम्मेदार ठहराई जा सकती है. इंदिरा के आपात काल के बाद बिहार को कई नए चेहरों से रूबरू होना पड़ा. लालू यादव, नीतीश कुमार, सुशील मोदी और रविशंकर प्रसाद जैसे नेताओं का उदय यहीं से हुआ. इसके बाद लंबे समय तक बिहार की किस्मत पर लालू ने कब्जा किया तो उसके बाद नीतीश कुमार बिहार की कहानी अपने तरीके से लिख रहे हैं. लेकिन इन सबके बीच बिहार वहीं का वहीं खड़ा है.अपनी लाचारी, बेबसी और गरीबी की कहानी लिए.
लालू का शासन बिहार के लिए दुविधापूर्ण रहा. नए संस्थान, उद्योग और ट्रेनें मिलीं जरूर लेकिन भय, भ्रष्टाचार और हिंसा ने बिहार को पीछे की ओर ढकेल दिया. लालू के समर्थक, जो बड़े पैमाने पर बेरोजगार युवा थे, व्यवसायियों को परेशान करना शुरू कर दिया, जिसने अर्थव्यवस्था को और चौपट करने में सहयोग किया. इससे पलायन को भी बल मिला. रोजगार की दिशा में बिहार पिछड़ता चला गया. समग्र विकास के बजाय कुछ ही क्षेत्रों के विकास तक लालू सीमित रह गए और जातिवाद तथा जंगलराज ने लालू के शासन का अंत कर दिया.
नीतीश का दौर आया, बिहार ने नए परिवर्तन के सपने देखे मगर हकीकत से दूर यह सपना ही रह गया. बिहार के युवा बेहतर शिक्षा और नौकरी के अवसरों की तलाश में देश के अन्य हिस्सों में पलायन कर रहे हैं, जबकि परिधि के भीतर के राजनेता बुनियादी ढांचे को खत्म करने में लगे हुए हैं. नीतीश अक्सर केंद्र सरकार पर भेदभाव का आरोप लगाते रहे हैं और पिछड़ेपन के लिए केंद्र को जिम्मेदार बताते रहे हैं.हालांकि केंद्र सरकार भी राज्यों के पिछड़ेपन की जिम्मेदार हैं क्योंकि कई ऐसे विषय होते हैं जो समवर्ती सूची में होते हैं और वे जनहित को प्रभावित करते हैं. राज्यों के विकास का आकलन भी केंद्र की जिम्मेदारी है, जाहिर है यह जिम्मेदारी ईमानदारी से नहीं उठाई गयी और बिहार की जनता इसकी भरपाई कर रही है.
बिहार क्रांति और आंदोलन की भूमि रही है. यहां की जनता ने परिवर्तन का आइना देश तक को दिखाया है लेकिन लंबे समय से स्थानीय लोगों को अपने हक के लिए संघर्ष करते नहीं देखा गया, जिसके चलते सरकारें मनमानी, अहंकारी, दमनकारी और निरंकुश होती चली गईं और बिहारियों को दूसरे प्रदेशों की ओर रुख करना पड़ गया. फिलहाल, अगर बिहार को विशेष राज्य का दर्जा मिल भी जाता है तो वह सकारात्मक ही माना जाएगा. पर लाख टके का सवाल है: बिहार अपनी विडंबनाओं से कैसे बाहर निकलेगा?

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