असहयोग आंदोलन: बापू का वह आंदोलन जिसने स्वराज की चिंगारी को हवा दी


देश बापू का कर्जदार है और समाज इस कर्ज को उतारने के लिए बाध्य. हालांकि बापू किसी व्यक्ति या वस्तु का नाम नहीं है बल्कि बापू विचार का नाम है. बापू के जीवन का सार ही प्रेरणा है. जिसका अनुकरण ही एकमात्र विकल्प. बापू ने देश को बाधाओं से मुक्त कराने के लिए अपना संपूर्ण जीवन महायज्ञ में लगा दिया था. बापू ने दुनिया को शांति के सहारे संघर्ष को परिणाम में बदलने का हुनर सिखाया. अहिंसा के पुजारी बापू ने देश और समाज को एकजुट करने के लिए, देश को अंग्रेजों के चंगुल से मुक्त कराने के लिए अनेकों आंदोलन किए. कहा जा सकता है कि बापू का जीवन आंदोलनों से भरा है. चंपारण सत्याग्रह से बापू ने हक के लड़ाई की शुरुआत की. यहीं से देश में विद्रोह की चिंगारी आग का रूप लेने लगी थी. पांच महीने तक चले खेड़ा आंदोलन ने भी बापू को जननेता बना दिया था. अब बापू दूत के रूप में जन्म ले रहे थे. चहुंओर बापू की चर्चा होने लगी थी. इसी बीच 1919 में ब्रिटिश सरकार द्वारा लाया गया रौलेट एक्ट देशवासियों पर कहर बन रहा था. इस एक्ट के विरोध में 13 अप्रैल 1919 को पंजाब के जलियांवाला बाग में हुए भारतीयों के नरसंहार से देश जल रहा था. हर भारतीय के भीतर बदले की ज्वाला भभक रही थी. तभी इस ज्वाला को बापू ने समझने का काम किया.

लाला लाजपत राय की अध्ययक्षता में हुए कलकत्ता अधिवेशन में बापू के नेतृत्व में असहयोग आंदोलन का प्रस्ताव प्राप्त हुआ. बापू ने ब्रिटिश सरकार के विरोध में सितंबर 1920 में असहयोग आंदोलन की घोषणा कर दी. बापू का यह आंदोलन महज आंदोलन नहीं साबित हुआ बल्कि स्वराज की भावना का उद्गम का श्रोत बना. देशवासियों ने भी इस आंदोलन में बापू का पुरजोर साथ दिया. जो इस आंदोलन की सबसे बड़ी ताकत साबित हुई. असहयोग आंदोलन 1920 से लेकर 1922 तक चला लेकिन1922 में चौरी चौरा कांड के कारण बापू को असहयोग आंदोलन को वापस लेना पड़ा. खैर, इस आंदोलन ने स्वतंत्रता की चिंगारी को हवा दे दी थी.

यह आंदोलन क्रांतिकारी आंदोलन साबित हुआ. इस आंदोलन के माध्यम से बापू ने लोगों से आग्रह किया कि जो भारतीय उपनिवेशवाद का खत्म करना चाहते हैं वे स्कूलों, कॉलेजों और न्यायालय न जाएं और न ही कर चुकाएं. अपने शुरुआती दौर में असहयोग आंदोलन चरम पर था लेकिन इस आंदोलन के दौरान 5 फरवरी, 1922 को आंदोलनकारियों द्वारा गोरखपुर के पास स्थित चौरा चौरी नामक स्थान पर हिंसा की घटना हो गई उनके द्वारा एक थानेदार और 21 सिपाहियों को जलाकर मार डाला गया. इस घटना से बापू आहत बहुत आहत हुए. बापू ने असहयोग आंदोलन को हिंसक होता देख अपने सिद्धांत सत्य और अहिंसा के आधार पर कायम रहते हुए 12 फरवरी, 1922 को असहयोग आंदोलन को वापस ले लिया.

बापू के इस आंदोलन ने अंग्रेजी साम्राज्य को हिलाकर रख दिया था. जबकि बापू ने कहा था कि यदि असहयोग का ठीक ढंग से पालन किया जाए तो भारत एक वर्ष के भीतर स्वराज प्राप्त कर लेगा. असहयोग आंदोलन को वापस लेने के बाद ही बापू को सरकार ने 10 मार्च, 1922 को गिरफ्तार कर लिया और 6 साल की सजा सुनाई गई.

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