बालश्रम: अपराध है; अभिशाप भी।

वास्तव में जिस उम्र में बच्चों को शिक्षा, खेल-खिलौने, प्यार-स्नेह और आत्मीयता मिलनी चाहिए और आंखों में सुनहरे भविष्य के सपने होने चाहिए उस उम्र में फटे हुए गुब्बारे की तरह उनकी फूटी हुई किस्मत ने इन सपनों को देखने का हक़ नहीं दिया।
बचपन वह अनोखा क्षण य कहें ऐसी अवस्था है,जो पूरा जीवन आनन्दित करता रहता है, लेकिन बचपन का अपना परिचय बदल जाना इन बेक़सूर बच्चों के लिए कितना दुर्भाग्यपूर्ण है, इसका जिम्मेदार किसको ठहराया जाए।आखिर इनका जन्म लेना इनके लिए अभिशाप तो नही?
बचपन वह है जिसमें न कोई चिंता, न कोई शोर, यहाँ प्रेम है,स्नेह है, आत्मीयता है, अपनत्व है, दुलार है, उमंग है, उल्लास है, नासमझ सपने हैं, न कोई डर है, न कोई जिम्मेदारी ,इसमे खेल है, अपने घर हैं, अपना भोजन भी इन सब से मिलकर बनता है बचपन। लेकिन दुर्भाग्यवस देश मे कुछ ऐसे भी बचपन हैं जिनमें बचपन के तत्व नहीं है।  उनमें नीरसता और विवशता है।

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