दहेज: एक नजरिया
दहेज: एक नजरिया
सामान्यतः पहले के समय में दहेज को विवाहों में उपहार के रूप में दिया जाता था जो स्वेचछापूर्ण होता था, य कहे कि पिता अपनी पुत्री को प्रेम के रूप में भेंट देते थे, जिसे पुत्री सुखी जीवन व्यतीत करें उसके उपलक्ष्य में दहेज स्वरूप आशीर्वाद भेंट करते थे। विवाह सदियों से चली आ रही व्यवस्था है जिसे पवित्र संस्कार माना जाता रहा है, आज इस संस्कार में आधुनिकता आयी है।
भारत एक लोकतांत्रिक एवं समाधिकर देश है।यहां पर सबको समान अवसर प्राप्त है यूं कहें तो यहां सबको समान अधिकार है।आज भारत में राजनीति का बिंदु भी अधिकारों के इर्द गिर्द घूमती रहती है जिसमें युवाओं / महिलाओं के अधिकारों का शोषण प्रमुखता से दिखाई व सुनाई पड़ते हैं।
आज भारत में शादियों में दहेज अहम मायने रखने लगा है जिससे रिश्तों के मायने भी बदले हैं। दहेज के नाम पर धन उगाही य कहें तो लूट जैसे धंधे चल रहे हैं। दहेज बुराई का पर्याय बनती जा रही है। समान अधिकार की बात करने वाली भारतीय संविधान को दहेज कहीं न कहीं कलंकित कर रही है।दहेज के माध्यम से महिलाओं का शोषण य उनके अधिकारों का हनन हो रहा है।
आज दहेज के चलते कितनी लड़कियां मार दी जा रही हैं तो कितनी आत्महत्या करने पर विवश हैं। एक गरीब पिता दहेज न दे पाने की स्थिति में बेटी की शादी नहीं कर पा रहे ,तो गरीब परिवार में ब्याहने पर मजबूर होते हैं। हालांकि दहेज एक अपराध है परन्तु धरातल पर यह अपराध तेजी से बढ़ रहा है जिस देश में नारी को देवी कहा जाता है उस देश में दहेज के नाम पर स्त्रियों की हत्या तक हो जाती है , यह बताता है की 70 साल पहले भौतिक रूप से आजाद तो हो गये लेकिन आज भी मानसिक रूप से हमारे अंदर विकृति सोच जिंदा है।


दहेज लेना पाप है या नही इससे कोई फर्क नही पड़ता इंडिया में चाहे जितना भी जन जागरूकता अभियान चला लो जब तक स्वयं में बदलाव नही लाओगे कुछ न भला होने वाला है समाज का इसलिए अपने को बदलने का प्रयत्न करें क्योंकि हम आप भी समाज का हिस्सा है
ReplyDeleteशुक्रिया त्रिशूल ..आप की बात पर अमल करूर करूंगा ,, उम्मीद है कि समाज इस बदलाव की ओर आगे बढ़ेगा
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