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Showing posts from April, 2018

धर्म वही जो आगे बढ़ाए

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आज पूरे विश्व में सभी अपनी पहचान स्थापित करने की दौड़ में है और उसके लिए लड़ रहै हैं। विश्व में रहने वाले सभी व्यक्तियों का कोई ना कोई धर्म है। सबकी अपने धर्म के प्रति सोच, समझ और संवेदनाएं जुड़ी होती हैं और सभी धर्म का आदर व सम्मान करते हैं। परंतु आज धर्म की वास्तविक स्थिति बदलती नजर आ रही है। धर्म कट्टरता का पर्याय बनता जा रहा है। सभी धर्मों के अनुयायी अपने धर्म के प्रति कट्टर बने रहते हैं, और उपदेश देते हैं कि इंसानियत से बड़ा कोई धर्म नहीं होता।  आखिर  धर्म के नाम पर हत्या, संघार, विनाश करना क्या यही इंसानियत है क्या कोई धर्म यही संदेश देता है? आज एक धर्म दूसरे धर्म को खत्म करने पर आमादा है। आज धर्म के जिस रूप को प्रचारित एवं व्याख्यायित किया जा रहा है उससे बचने की जरूरत है,वास्तव में धर्म संप्रदाय नहीं है। धर्म मनुष्य में मानवीय गुणों के विकास की प्रभावना है, सार्वभौम चेतना का सतसंकल्प है। आज धर्म के मायने व उसका अर्थ बदलता जा रहा है। धर्म के नाम पर अनेक तर्क कुतर्क किए जा रहे हैं, जो स्वस्थ समाज में विसंगतियां बढ़ा रही है। धर्म स्वतंत्रता/आजादी का प्रेरक होता है परं...

पेपरलीक: अटकाना, लटकाना और भटकाना

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परीक्षा का अर्थ य संबन्ध आकलन करने से होता है। परीक्षा वह आधार है जिससे प्रतिभा, क्षमता, योग्यता और गुणवत्ता की पहचान की जाती है। यह एक ऐसी प्रक्रिया होती है जिससे मनुष्य अपना सब कुछ देकर स्वयं को श्रेष्ठ सिद्ध करता है। किसी भी नवनिर्माण में या प्रगति में प्रतिभा की आवश्यकता होती है और उस प्रतिभा को पहचानने व छांटने के लिए परीक्षा प्रक्रिया सुगम व्यवस्था है और यदि परीक्षा में पारदर्शिता व ईमानदारी नहीं हो तो परीक्षा का कोई उद्देश्य नहीं है। पिछले कुछ सालों में सरकारी परीक्षाओं सरकार द्वारा आयोजित की जा रही  प्रतियोगी परीक्षाओं में पेपर लीक जैसे बात आम होती जा रही है जो किसी व्यवस्था की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिन्ह लगाने जैसा है। पेपर लीक होना सरकार की मंशा  व कार्यपद्धति पर सवाल उठाता है। विश्वास बनाए रखने में चुनौती पैदा होने लगती है परीक्षा जैसे गंभीर विषय पर व्यवस्था का फेल होना सरकार के हर तरफ नाकामी का परिचायक है। यदि परीक्षा से पूर्व पेपर लीक हो जाते हैं तो यह कहा जा सकता है की जिन परीक्षाओं में पेपर लीक होने की ख़बर नहीं आती ऐसे में रिजल्ट में गड़बड़ी हो ऐसे अनुमान ल...

दहेज: एक नजरिया

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दहेज: एक नजरिया २१ वीं सदी में दहेज को तवज्जो क्यों दिया जा रहा है?हालांकि दहेज परंपरा सदियों से चली  रही है, परन्तु आज दहेज के मायने बदलते जा रहे हैं।दहेज अभिशाप बनता  जा रहा है, क्योंकि यह व्यावसायिक रूप में परिवर्तित होता जा रहा है, जो कि समाज के लिए कैंसर की तरह है। सामान्यतः पहले के समय में दहेज को विवाहों में उपहार के रूप में दिया जाता था जो स्वेचछापूर्ण होता था, य कहे कि पिता अपनी पुत्री को प्रेम के रूप में भेंट देते थे, जिसे पुत्री  सुखी जीवन व्यतीत करें उसके उपलक्ष्य में दहेज स्वरूप आशीर्वाद भेंट करते थे। विवाह सदियों से चली आ रही व्यवस्था है जिसे पवित्र संस्कार माना जाता रहा है, आज इस संस्कार में आधुनिकता आयी है। भारत एक लोकतांत्रिक एवं समाधिकर देश है।यहां पर सबको समान अवसर प्राप्त है यूं कहें तो यहां सबको समान अधिकार है।आज भारत में राजनीति का बिंदु भी अधिकारों के इर्द गिर्द घूमती रहती है जिसमें युवाओं / महिलाओं के अधिकारों का शोषण प्रमुखता से दिखाई व सुनाई पड़ते हैं। आज भारत में शादियों में दहेज अहम मायने रखने लगा है जिससे रिश्तों के मायने भी बदले हैं...