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साहित्यिक सेवाओं के लिए पद्मभूषण से सम्मानित हुए थे हजारी प्रसाद द्विवेदी

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हिन्दी साहित्य के महान विभूतियों में से एक आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का योगदान अद्वितीय है. रचनात्मक प्रतिभा के धनी आचार्य द्विवेदी आलोचक के साथ-साथ बड़े रचनाकार भी थे. कई विद्वानों का मानना है कि उन्होंने ही कबीर जैसे महान संत को दुनिया से परिचित कराया. सामान्य परिवार में जन्में द्विवेदी का जीनव संघर्षों से भरा रहा है. उन्होंने संघर्षों से मुंह न मोड़ते हुए उसका डटकर सामना किया और जीवन को सार्थक बनाया. आचार्य द्विवेदी को याद किया जाता है तो उनके व्यक्तित्व की चर्चा खुद ब खुद लोगों के बीच आ ही जाती है. उनका व्यक्तित्व बड़ा प्रभावशाली और उनका स्वभाव बड़ा सरल और उदार था. हजारीप्रसाद द्विवेदी हिन्दी निबन्धकार, आलोचक और उपन्यासकार थे. उनका जन्म ब्राह्मण कुल में श्रावण शुक्ल एकादशी संवत् 1964 तदनुसार 19 अगस्त 1907 ई० को उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के 'आरत दुबे का छपरा', ओझवलिया नामक गाँव में हुआ था. इनके पिता का नाम श्री अनमोल द्विवेदी और माता का नाम श्रीमती ज्योतिष्मती था. इनका परिवार ज्योतिष विद्या के लिए प्रसिद्ध था. इनके पिता पं. अनमोल द्विवेदी संस्कृत के प्रकांड ...

चंपारण आंदोलन: गांधी जी के स्वतंत्रता संघर्ष का भारत में पहला कदम

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देश बापू यानी राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का 150वां जयंती वर्ष मना रहा है. महात्मा गांधी का पूरा नाम मोहन दास करमचंद गांधी था. इनका जन्म गुजरात के पोरबंदर में 2 अक्टूबर 1869 को हुआ था. देश गर्व से मोहनदास करमचन्द गांधी को बापू, महात्मा, राष्ट्रपिता जैसे उपनामों से संबोधित करता है. भारत और भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के लिए बापू विरले थे. उनका योगदान विश्व प्रसिद्ध है और पूरा विश्व उनके योगदान का ऋणी है. बापू ने देश दुनिया को मानवता का संदेश दिया. सत्य, अहिंसा, विश्वास, सच्चाई, सादगी, संघर्ष, देशप्रेम, मानव प्रेम आदि सिद्धांत हैं, जिनके आधार पर बापू ने जीवनयात्रा की. बापू की संपूर्ष जीवन यात्रा ही लोगों के लिए संदेश है, प्रेरणा है. कुरीतियों से दूर सच्चे महामानव थे बापू. उन्होंने अपने आदर्शों, विचारों और सिद्धांतों के जरिए दुनिया को बताया कि सच्चे संकल्प, पूर्ण ईमानदारी, धैर्य, अहिंसा के बलबूते भी अधिकारों की रक्षा की जा सकती है. बापू किसानों, श्रमिकों, मजदूरों के सच्चे मसीहा थे. वह जीवनपर्यंत दूसरों के हक और हूकूम की लड़ाई लड़ते रहे. समान भाव के साथ वह सबकी सेवा करते रहे. उन्होंने कभी ...

माकपा के हाथों से रेत की तरह फिसलती रही बंगाल की चाभी, किले में शून्य के आसार

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पश्चिम बंगाल में लंबे समय तक एकछत्र आधिपत्य करने वाला वामदल धीरे-धीरे शून्य की ओर खिसकता जा रहा है. वक्त ने ऐसे पायदान पर लाकर खड़ा कर दिया है कि झंडा उठाने की बात तो दूर पार्टी के नाम लेने वालों की भी संख्या कर पाना मुश्किल हो रहा है. तमाम सर्वे एजेंसियों द्वारा 2019 के लोकसभा चुनाव के एग्जिट पोल जारी किए जा रहे हैं. जिसमें माकपा के लिए अच्छे संकेत नजर नहीं आ रहे हैं. एग्जिट पोल के मुताबिक 34 वर्षों तक बंगाल पर राज करने वाली माकपा का अस्तित्व अंत की ओर है. 2014 के लोकसभा चुनाव में दो सीट पाने में सफल माकपा का खाता खुलता भी नहीं दिख रहा है. उल्लेखनीय है कि पश्चिम बंगाल में लोकसभा की 42 सीटें हैं.  बात करें 1980 के लोकसभा चुनाव की तो वाममोर्चा को इस चुनाव में 38 सीटों पर जीत हासिल हुई थी और 50 फीसदी वोट भी मिले थे. एक लंबे वक्त तक लालकिले से मशहूर बंगाल में माकपा का अपना वर्चस्व रहा है. 1996 के लोकसभा चुनाव में भी माकपा को 33 तो 2004 के आम चुनाव में 34 सीटें हासिल हुई थी. वक्त की नजाकत का असर देखिए कि 5 वर्षों में ही सियासत में अप्रतिम छाप रखने वाली माकपा को अपने ही गढ़ में ...

कु्म्भ : आस्था और भक्ति का एक सुखद एहसास

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आज हम आपको कुम्भ को लेकर कुछ ऐसे रोचक तथ्यों से रूबरू करा रहे हैं जो कुम्भ को दिव्य कुम्भ और भव्य कुम्भ तक बना देता है. कुम्भ का नाम आते ही अंतर्मन में एक आस्था और अध्यात्म का उद्गम स्वयंभू हो जाता है. कुम्भ नाम मात्र से निर्मल गंगा का विशाल तट आपको अपनी ओर आकर्षित करता है तो नागा साधुओं का विहंगम स्वरुप आपको मोक्ष की याद दिलाता है. मां गंगा में डुबकी लगा रहे करोड़ों लोग मानो आस्था और भक्ति का एक नए स्वरुप से रुबरु करा रहे हों.  अध्यात्म, संस्कृति, धर्म, पर्व, परंपरा का देश कहा जाने वाला भारत का इतिहास गौरवशाली रहा है तो प्रेरणादायी भी. भारत की मिट्टी में न जाने कितने ऐसे विरले जन्म लिए जो भारत के इतिहास को अजर अमर कर गए. अध्यात्म का जनक कहा जाने वाला भारत अनेकों ऐसे साधु-संतों को जन्म दिया जिन्हें इतिहास आज भी अपनी विरासत के रुप में संजोए हुए है. इसी अध्यात्म की कड़ी को आगे बढ़ा रहा कुंभ भी अपनी अलग पहचान रखता है. जिससे जुड़ी कुछ रोचक जानकारियां हम आप तक पहुंचा रहे हैं. जहां कुंभ का प्रमुख आकर्षण साधु-संतों के 13 अखाड़े होते हैं। वहीं अब इसमें दो अखाड़े और शामिल...

डिजिटल विज्ञापन: यम्मी फूड डेलिवरी ऐप

यम्मी फूड डेलिवरी ऐप: दौड़ती भागती जिंदगी में हर व्यक्ति के पास समय का अभाव है. कोई काम की तलाश में भागता फिर रहा है तो कोई काम के पीछे भागता फिर रहा है. ऐसे में हर कोई काम को लेकर इतना मशगूल हो जाता है कि खाना पीना भी भूल जाता है. सुबह आफिस निकलने के जल्दी में व्यक्ति लंच रखना भूल जा रहा है तो कोई खाना ही छोड़ जाता है. वहीं घर से दूर बाहरअकेले रह रहे व्यक्ति के लिए खाना रहना एक बड़ी समस्या है. ऐसे में वह इंसान बाहर की चीजों के सहारे हो जाता है. फिर वह डिजिटल दौर में ड़िजिटल तरीकों से सुविधाओं का सहारा लेता है. ऐसे हर किसी व्यक्ति के बारे में सोच कर उनकी खाने जैसी परेशानियों का निपटारा करने के लिए डिजिटल फूड डेलिवरी ऐप बनाया गया है. जिसकी झलक वीडियो के जरिए देख सकते हैं. 

जानें! भाई दूज मनाने के पीछे क्या है मान्यता?

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पांच दिन तक चलने वाले दीपावली पर्व के अंतिम दिन भाई दूज का पर्व मनाया जाता है. कार्तिक शुक्ल पक्ष की द्वितीय तिथि को यह पर्व मनाया जाता है. यह पर्व यमराज और उनकी बहन यमुना से सम्बंधित है. इस पर्व को भाऊ बीज, टिक्का, यम द्वितीया और भातृ द्वितीया के नाम से भी जाना जाता है. यह त्‍योहार भाई-बहनों के बीच प्रेम और स्नेह भाव को बढ़ाता है. इस दिन बहनें भाई की लंबी आयु और उनके स्वास्थ्य की मंगलकामना का व्रत रखती हैं. भाई बहन के इस पर्व पर बहन भाई के टीका कर उसकी लम्बी उम्र की कामना करती है. इस पर्व को भातृ द्वितीया भी कहा जाता है.  कहा जाता है कि सूर्य की पत्नी संज्ञा के पुत्र यम और पुत्री यमुना दो संतान थी. सूर्य के तेज को न सह सकने के कारण संज्ञा ने छाया का वेश बनाया और वो उत्तरी ध्रुव में जा कर रहने लगी, तभी से यमुना पृथ्वी पर आकर रहने लगी और यहीं रहकर कृष्ण का इंतजार करने लगीं. यहीं पर यमराज भाई दूज के दिन अपनी बहन यमुना के पास आये. जहाँ यमुना ने अपने भाई का खूब सत्कार किया. जिससे खुश होकर यमराज ने यमुना से वरदान मांगने को कहा. इस पर यमुना ने कहा कि भाई दूज के दिन अगर इस जगह पर भा...

शहरों का आकर्षण, गांव से मोहभंग का बन रहा कारण

गांवों में बसने वाला भारत बड़ी तेजी से शहरों की ओर आकर्षित होता जा रहा है और लोगों का गांवों से मोहभंग भी होता जा रहा है. अगर यह मोहभंग ऐसे ही जारी रहा तो यह कहना गलत नहीं होगा कि आने वाले समय में भारत की वास्तविक पहचान धीरे-धीरे बदल सकती है. गांवों से पलायन करने के मुख्य कारणों में अगर रोजी-रोजगार है तो कहीं न कहीं मूलभूत सुविधाओं का अभाव होना भी एक महत्वपूर्ण वजह है. आज जीवनयापन के लिए गांवों में रोजगार की सुविधा न होने के कारण लोग घर-परिवार छोड़कर नौकरी की चाह में शहरों की ओर ताक रहे हैं. पलायन के चलते कहीं न कहीं इससे कृषि क्षेत्र भी प्रभावित हो रहा है. कृषि प्रधान देश कहा जाने वाला भारत अपने किसानों को जीवनयापन के लिए आधार बनने के बजाय आधार खोता जा रहा है. कृषि के परिणाम से विवश होकर लोग अन्य रास्ता चुनने पर मजबूर हो रहे हैं. कृषि क्षेत्र में अग्रणी भूमिका निभाने वाले भारत के लिए कृषि चुनौती बनता जा रहा है. कृषि क्षेत्र में घटता लाभ और बढ़ती महंगाई अन्य व्यवसाय चुनने के लिए विवश कर रही है.  आज हर एक परिवार से एक न एक सदस्य शहरों में नौकरी के लिए जाने को मजबूर हैं. और जो जा रह...